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13/11/19

प्रश्न 33: उस समय, जब प्रभु यीशु अपने कार्य को करने के लिए आया था, यहूदी फरीसियों ने उसका अंधाधुंध विरोध किया, उसकी निंदा की और उसे क्रूस पर कीलों से जड़ दिया। जब अंतिम दिनों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए आता है, तो धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग उसकी भी अवहेलना और निंदा करते हैं, परमेश्वर को फिर एक बार क्रूस पर चढ़ाते हैं। यहूदी फरीसी, धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग इस तरह सत्य से नफरत क्यों करते हैं और क्यों इस तरह मसीह के विरुद्ध खुद को खड़ा कर देते हैं? वास्तव में उनका निहित सार क्या है?

 उत्तर:
प्रभु में विश्वास करने वाला हर व्यक्ति जानता है कि फरीसियों ने प्रभु यीशु का विरोध किया। लेकिन उनके विरोध की जड़ और उसका असल सार क्या था? आप कह सकते हैं कि धर्म के 2,000 वर्षों के इतिहास में, कोई भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं ढूंढ पाया है। हालाँकि प्रभु यीशु के फरीसियों को शाप देने के बारे में नये विधान में उल्लेख है, लेकिन कोई भी फरीसियों के सार को समझ नहीं पाया है।

21/7/19

3. अंतिम दिनों में परमेश्वर के द्वारा व्यक्त सच्चाई मनुष्य को शुद्ध करने, उसे परिपूर्ण करने और उसका जीवन बन जाने में सक्षम क्यों है?

 परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:
जीवन का मार्ग कोई साधारण चीज़ नहीं है जो चाहे कोई भी प्राप्त कर ले, न ही इसे सभी के द्वारा आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। यह इसलिए कि जीवन केवल परमेश्वर से ही आता है, कहने का अर्थ है कि केवल स्वयं परमेश्वर ही जीवन के तत्व का अधिकारी है, स्वयं परमेश्वर के बिना जीवन का मार्ग नहीं है, और इसलिए केवल परमेश्वर ही जीवन का स्रोत है, और जीवन के जल का सदा बहने वाला सोता है।

12/7/19

1. वह सच्चा परमेश्वर जिसने आकाश, पृथ्वी और सब कुछ बनाया है, एक है या तीन है?

 संदर्भ के लिए बाइबल के पद:
"फिलिप्पुस ने उससे कहा, 'हे प्रभु, पिता को हमें दिखा दे, यही हमारे लिये बहुत है।' यीशु ने उससे कहा, 'हे फिलिप्पुस, मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूँ, और क्या तू मुझे नहीं जानता? जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है। तू क्यों कहता है कि पिता को हमें दिखा? क्या तू विश्‍वास नहीं करता कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है? ये बातें जो मैं तुम से कहता हूँ, अपनी ओर से नहीं कहता, परन्तु पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है'" (युहन्ना 14:8-10)।

8/5/19

परमेश्वर के वचनों का एक भजन इंसान वो नहीं रहा जैसा परमेश्वर चाहता है




परमेश्वर के वचनों का एक भजन
इंसान वो नहीं रहा जैसा परमेश्वर चाहता है

हज़ारों बरस लगे हैं इंसान को
वहाँ पहुँचने में जहाँ वो आज है।
बहुत पहले मगर पतन हो चुका है उस इंसान का,
मूल रूप से जैसा परमेश्वर ने उसे बनाया था।
I
परमेश्वर के अस्तित्व में भरोसा नहीं इंसान को,
न स्वागत करता वो उसके आगमन का।
बेमन से मानता है वो उसके अनुरोध को,
साझा नहीं करता उससे ज़िंदगी के ग़म और ख़ुशियों को सच में।
चूँकि अगम्य मानते हैं लोग परमेश्वर को,
मजबूरन मुस्कराते हैं देखकर उसे,
ख़ुशामदी रवैया अपनाते हैं उसके लिये,
क्योंकि लोग न परमेश्वर के काम को जानते हैं न उसकी इच्छा को।
मानवता नहीं वो जो चाहता है परमेश्वर।
"मानवता" शब्द का हकदार नहीं इंसान।
ऐसा नीच है इंसान जिसे बंदी बनाए हुए है शैतान,
चलती-फिरती लाश है वो जिसमें रहता है शैतान।

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