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4/6/19

4. आज तक परमेश्वर ने कैसे मानव जाति का नेतृत्व और भरण-पोषण किया है?

परमेश्वर के कार्य के तीन चरण
4. आज तक परमेश्वर ने कैसे मानव जाति का नेतृत्व और भरण-पोषण किया है?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:
परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य संसार की उत्पत्ति से प्रारम्भ हुआ था और मनुष्य उसके कार्य का मुख्य बिन्दु है। ऐसा कह सकते हैं कि परमेश्वर की सभी चीज़ों की सृष्टि, मनुष्य के लिए ही है। क्योंकि उसके प्रबंधन का कार्य हज़ारों सालों से अधिक में फैला हुआ है, और यह केवल एक ही मिनट या सेकंड में या पलक झपकते या एक या दो सालों में पूरा नहीं होता है, उसे मनुष्य के अस्तित्व के लिए बहुत-सी आवश्यक चीज़ों का निर्माण करना पड़ा जैसे सूर्य, चंद्रमा, सभी जीवों का सृजन और मानवजाति के लिए आहार और रहने योग्य पर्यावरण। यही परमेश्वर के प्रबंधन का प्रारम्भ था।
"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है" से

30/4/19

4. परमेश्वर के कार्य के तीन चरण किस तरह क्रमशः गहनतर होते जाते हैं ताकि लोगों को बचाया जा सके और उन्हें परिपूर्ण किया जा सके?

परमेश्वर के कार्य के तीन चरण,परमेश्वर का उद्धार
4. परमेश्वर के कार्य के तीन चरण किस तरह क्रमशः गहनतर होते जाते हैं ताकि लोगों को बचाया जा सके और उन्हें परिपूर्ण किया जा सके?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:
परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन को तीन चरणों में विभक्त किया गया है, और प्रत्येक चरण में, मनुष्य से यथोचित अपेक्षाएं की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, जैसे जैसे युग बीतते एवं आगे बढ़ते जाते हैं, परमेश्वर की समस्त मानवजाति से अपेक्षाएं और अधिक ऊँची होती जाती हैं।इस प्रकार, कदम दर कदम, परमेश्वर का प्रबंधन अपने चरम पर पहुंच जाता है, जब तक मनुष्य "देह में वचन के प्रकट होने" को देख नहीं लेता, और इस तरह से मनुष्य से की गई अपेक्षाएं और अधिक ऊँची हो जाती हैं, और गवाही देने के लिए मनुष्य से अपेक्षाएं और भी अधिक ऊँची हो जाती हैं। … अतीत में, मनुष्य से अपेक्षा की गई थी कि वह व्यवस्था एवं आज्ञाओं का पालन करे, और उससे अपेक्षा की गई थी कि वह धैर्यवान एवं विनम्र हो। आज, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का पालन करे और परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम को धारण करे, और अन्ततः उससे अपेक्षा की जाती है कि वह क्लेश के मध्य भी परमेश्वर से प्रेम करे। ये तीन चरण ऐसी अपेक्षाएं हैं जिन्हें परमेश्वर कदम दर कदम अपने सम्पूर्ण प्रबंधन के दौरान मनुष्य से करता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले चरण की तुलना में और अधिक गहरा होता जाता है, और प्रत्येक चरण में मनुष्य से की गई अपेक्षाएं पिछले चरण की तुलना में और अधिक गम्भीर होती हैं, और इस तरह से, परमेश्वर का सम्पूर्ण प्रबंधन धीरे धीरे अपना आकार लेता है। मनुष्य से की गई अपेक्षाएं हमेशा से कहीं अधिक ऊँची हो जाने के कारण ही मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर के द्वारा अपेक्षित उन मापदंडों के कहीं अधिक नज़दीक आ जाता है, और केवल तभी सम्पूर्ण मानवजाति धीरे धीरे शैतान के प्रभाव से अलग होती है, जब परमेश्वर का कार्य पूर्ण समाप्ति पर आ जाता है, तब तक सम्पूर्ण मानवजाति को शैतान के प्रभाव से बचा लिया जाता है।
"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार" से

29/4/19

3. परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के बीच सभी का पारस्परिक संबंध।

परमेश्वर के कार्य के तीन चरण,परमेश्वर को जानना

3. परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के बीच सभी का पारस्परिक संबंध।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:
यहोवा के कार्य से ले कर यीशु के कार्य तक, और यीशु के कार्य से लेकर इस वर्तमान चरण तक, ये तीन चरण परमेश्वर के प्रबंधन की पूर्ण परिसीमा को आवृत करते हैं, और यह समस्त एक ही पवित्रात्मा का कार्य है। जब से उसने दुनिया बनाई, तब से परमेश्वर हमेशा मानव जाति का प्रबंधन करता आ रहा है। वही आरंभ और अंत है, वही प्रथम और अंतिम है, और वही एक है जो युग का आरंभ करता है और वही युग का अंत करता है। कार्य के तीन चरण, विभिन्न युगों और विभिन्न स्थानों में, निश्चित रूप से एक ही पवित्रात्मा द्वारा किए जाते हैं। वे सभी जो इन तीन चरणों को पृथक करते हैं, परमेश्वर का विरोध करते हैं।
"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

28/4/19

2. परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में से प्रत्येक के उद्देश्य और महत्व को जानना।

परमेश्वर को जानना,परमेश्वर के कार्य के तीन चरण

2. परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में से प्रत्येक के उद्देश्य और महत्व को जानना।
(1) व्यवस्था के युग में परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य और महत्व
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:
वह कार्य जो यहोवा ने इस्राएलियों पर किया, उसने मानवजाति के बीच पृथ्वी पर परमेश्वर के मूल स्थान को स्थापित किया जो कि वह पवित्र स्थान भी था जहाँ वह उपस्थित रहता था। उसने अपने कार्य को इस्राएल के लोगों तक ही सीमित रखा। आरम्भ में, उसने इस्राएल के बाहर कार्य नहीं किया; उसके बजाए, उसने ऐसे लोगों को चुना जिन्हें उसने अपने कार्यक्षेत्र को सीमित रखने के लिए उचित पाया। इस्राएल वह जगह है जहाँ परमेश्वर ने आदम और हव्वा की रचना की, और उस जगह की धूल से यहोवा ने मनुष्य को बनाया; यह स्थान पृथ्वी पर उसके कार्य का आधार बन गया। इस्राएली, जो नूह के वंशज थे, और आदम के भी वंशज थे, पृथ्वी पर यहोवा के कार्य की मानवीय बुनियाद थे।

27/4/19

1. मानव जाति के प्रबंधन से सम्बंधित परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के उद्देश्य को जानो।

परमेश्वर के कार्य के तीन चरण,परमेश्वर को जानना

1. मानव जाति के प्रबंधन से सम्बंधित परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के उद्देश्य को जानो।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:
मेरी सम्पूर्ण प्रबन्धन योजना, ऐसी योजना जो छः हज़ार सालों तक फैली हुई है, तीन चरणों या तीन युगों को शामिल करती हैः आरंभ में व्यवस्था का युग; अनुग्रह का युग (जो छुटकारे का युग भी है); और अंत के दिनों में राज्य का युग। प्रत्येक युग की प्रकृति के अनुसार मेरा कार्य इन तीनों युगों में तत्वतः अलग-अलग है, परन्तु प्रत्येक चरण में यह मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप है—या बल्कि, अधिक स्पष्ट कहें तो, यह उन छलकपटों के अनुसार किया जाता है जो शैतान उस युद्ध में काम में लाता है जो मैं उसके विरुद्ध शुरू करता हूँ। मेरे कार्य का उद्धेश्य शैतान को हराना, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को व्यक्त करना, शैतान के सभी छलकपटों को उजागर करना और परिणामस्वरूप समस्त मानवजाति को बचाना है, जो उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन रहती है। यह मेरी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को दिखाने के लिए है जबकि उसके साथ-साथ ही शैतान की असहनीय करालता को प्रकट करती है। इससे भी अधिक, यह मेरी रचनाओं को अच्छे और बुरे के बीच में अन्तर करना सिखाने के लिए है, यह पहचानना सिखाने के लिए है कि मैं सभी चीज़ों का शासक हूँ, यह देखना सिखाने के लिए है कि शैतान मानवजाति का शत्रु है, व अधम से भी अधम है, दुष्ट है, और अच्छे एवं बुरे, सत्य एवं झूठ, पवित्रता एवं गन्दगी, और महान और हेय के बीच पूर्ण निश्चितता के साथ अंतर करना सिखाने के लिए है। इस तरह, अज्ञानी मानवजाति मेरी गवाही देने में समर्थ हो सकती है कि वह मैं नहीं हूँ जो मानवजाति को भ्रष्ट करता है, और केवल मैं—सृष्टि का प्रभु—ही मानवजाति को बचा सकता हूँ, मनुष्य को उसके आनन्द की वस्तुएँ प्रदान कर सकता हूँ; और उन्हें पता चल जाएगा कि मैं सभी चीज़ों का शासक हूँ और शैतान मात्र उन प्राणियों में से एक है जिनकी मैंने रचना की है और जो बाद में मेरे विरूद्ध हो गया। मेरी छः-हज़ार-सालों की प्रबंधन योजना को तीन अवस्थाओं में विभाजित किया जाता है ताकि निम्नलिखित प्रभाव को प्राप्त किया जाए: मेरी रचनाओं को मेरा गवाह बनने में सक्षम बनाना, मेरी इच्छा को समझना, और यह जानना कि मैं ही सत्य हूँ।
"वचन देह में प्रकट होता है" से "छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी" से

ईसाई गाने | अनुभव वीडियो "सारी दुनिया तेरी रोशनी की पनाह में आती"

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