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22/5/18

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार" (भाग दो)

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार" (भाग दो)



सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक उदाहरण में ऐसे दर्शन हैं जिन्हें मनुष्य के द्वारा पहचाना जाना चाहिए, ऐसे दर्शन जिनका अनुसरण मनुष्य के प्रति परमेश्वर की उचित अपेक्षाओं के द्वारा किया जाता है। बुनियाद के रूप में इन दर्शनों के बिना, मनुष्य साधारण तौर पर रीति व्यवहार में असमर्थ होगा, और न ही मनुष्य बिना लड़खड़ाए परमेश्वर का अनुसरण करने के योग्य होगा। यदि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता या परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझता, तो वह सब कुछ जो मनुष्य करता है वह व्यर्थ है, और परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाने के योग्य नहीं है।

13/5/18

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "सर्वशक्तिमान का आह भरना” | God's waiting of love


सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "सर्वशक्तिमान का आह भरना” | God's waiting of love



सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "मनुष्य, जिन्होंने सर्वशक्तिमान के जीवन की आपूर्ति को त्याग दिया, नहीं जानते हैं आखिर वे क्यों अस्तित्व में हैं, और फिर भी मृत्यु से डरते रहते हैं। इस दुनिया में, जहां कोई सहारा नहीं है, सहायता नहीं है, वहाँ बहादुरी के साथ, बिन आत्माओं की चेतना के शरीरों में एक अशोभनीय अस्तित्व को दिखाते हुए मनुष्य, अपनी आंखों को बंद करने में, अभी भी अनिच्छुक है। तुम इनके समान जीते हो, आशाहीन; उसका अस्तित्व इसी प्रकार का, बिना किसी लक्ष्य का है।

3/5/18

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "राज्य का युग वचन का युग है (भाग दो)"


सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "राज्य का युग वचन का युग है (भाग दो)"


सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "राज्य के युग में, परमेश्वर नए युग की शुरूआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने, और संपूर्ण युग में काम करने के लिये अपने वचन का उपयोग करता है। वचन के युग में यही वह सिद्धांत है, जिसके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। वह देहधारी हुआ ताकि विभिन्न दृष्टिकोणों से बातचीत कर सके, मनुष्य वास्तव में परमेश्वर को देख सके, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, और उसकी बुद्धि और आश्चर्य को जान सके। उसने यह कार्य इसलिए किये ताकि वह मनुष्यों को जीतने, उन्हें पूर्ण बनाने और ख़त्म करने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल कर सके। वचन के युग में वचन को उपयोग करने का यही वास्तविक अर्थ है।"

2/5/18

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन:"'सहस्राब्दि राज्य आ चुका है' के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता"


सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन:"'सहस्राब्दि राज्य आ चुका है' के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता"



सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "सहस्राब्दि राज्य के युग के दौरान, लोग पहले से ही पूर्ण बनाए जा चुके होंगे और उनके भीतर के भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध किया जा चुका होगा। उस समय, परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन क़दम-दर-क़दम लोगों का मार्गदर्शन करेंगे, और सृजन के समय से लेकर आज तक परमेश्वर के कार्य के सभी रहस्यों को प्रकाशित करेंगे, और उसके वचन प्रत्येक युग और प्रत्येक दिन परमेश्वर के कार्यों के बारे में लोगों को बताएँगे, बताएँगे कि कैसे वह भीतर उनका मार्गदर्शन करता है, उस कार्य के बारे में बताएँगे जो वह आध्यात्मिक क्षेत्र में करता है, और मनुष्य को आध्यात्मिक आयाम की गतिशीलता के बारे में बताएँगे। केवल तभी यह सचमुच में वचन का युग होगा; अभी यह केवल एक सूक्ष्म जगत है।"

29/4/18

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं"


सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं"



सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "मैं अपने घर में उन सब को बुलाता हूँ जिन्हें मैंने पूर्वनियत किया है ताकि मेरे वचनों को सुनने के लिए उन्हें एक श्रोतागण बनाया जाए, और फिर उन सभी को अपने सिंहासन के सामने रखा जाए जो मेरे वचन का पालन करते हैं और मेरे वचन की अभिलाषा करते हैं। जो मेरे वचनों की ओर पीठ फेर लेते हैं, जो मेरी आज्ञा का पालन करने और मेरे प्रति समर्पण करने में असफल रहते हैं, और जो खुलकर मेरी अवहेलना करते हैं, वे अंतिम दण्ड की प्रतीक्षा करने के लिए एक ओर डाल दिए जाएँगे। सभी मनुष्य भ्रष्टता के बीच और दुष्ट के हाथ के अधीन रहते हैं, इसलिए मेरा अनुसरण करने वालों में से बहुत से लोग वास्तव में सत्य की अभिलाषा नहीं करते हैं। कहने का अर्थ है कि, अधिकांश सच्चे हृदय से या सत्य के साथ मेरी आराधना नहीं करते हैं, बल्कि भ्रष्टता, विद्रोह और कपटपूर्ण उपायों से मेरा विश्वास प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। यही कारण है कि मैं कहता हूँ, बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं। वे सभी जो बुलाए गए हैं अत्यंत भ्रष्ट हैं और एकही युग में रहते हैं, किन्तु जो चुने गए हैं वे केवल वह समूह हैं जो सत्य पर विश्वास करते हैं और इसे स्वीकार करते हैं और जो सत्य का अभ्यास करते हैं। ये लोग समष्टि का एक मामूली हिस्सा होते हैं, और इन लोगों के बीच से मैं और भी अधिक महिमा प्राप्त करूँगा।"

26/4/18

परमेश्वर के कथन "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक" (भाग 1)


परमेश्वर के कथन "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक" (भाग 1)



सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "चाहे देहधारी परमेश्वर बोले, कार्य करे, या चमत्कार प्रकट करे, वह अपने प्रबंधन के अंतर्गत महान कार्य कर रहा है, और इस प्रकार का कार्य उसके बदले मनुष्य नहीं कर सकता है। मनुष्य का कार्य केवल सृजन किए गए प्राणी के रूप में परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के किसी दिए गए चरण में सिर्फ़ अपना कर्तव्य करना है। इस प्रकार के प्रबंधन के बिना, अर्थात्‌, यदि देहधारी परमेश्वर की सेवकाई खो जाती है, तो सृजित प्राणी का कर्तव्य भी खो जायेगा। अपनी सेवकाई को करने में परमेश्वर का कार्य मनुष्य का प्रबंधन करना है, जबकि मनुष्य का कर्तव्य करना सृष्टा की माँगों को पूरा करने के लिए अपने स्वयं के दायित्वों का प्रदर्शन है और किसी भी तरह से किसी की सेवकाई करना नहीं माना जा सकता है। परमेश्वर, अर्थात्‌, पवित्रात्मा के अंतर्निहित सार के लिए, परमेश्वर का कार्य उसका प्रबंधन है, किन्तु एक सृजन किए गए प्राणी का बाह्य स्वरूप पहने हुए देहधारी परमेश्वर के लिए, उसका कार्य अपनी सेवकाई को पूरा करना है। वह जो कुछ भी कार्य करता है वह अपनी सेवकाई को करने के लिए करता है, और मनुष्य केवल उसके प्रबंधन के क्षेत्र के भीतर और उसकी अगुआई के अधीन ही अपना सर्वोत्तम कर सकता है।"

परमेश्वर के कथन "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक" (भाग 2)


परमेश्वर के कथन "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक" (भाग 2)



सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "चाहे देहधारी परमेश्वर बोले, कार्य करे, या चमत्कार प्रकट करे, वह अपने प्रबंधन के अंतर्गत महान कार्य कर रहा है, और इस प्रकार का कार्य उसके बदले मनुष्य नहीं कर सकता है। मनुष्य का कार्य केवल सृजन किए गए प्राणी के रूप में परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के किसी दिए गए चरण में सिर्फ़ अपना कर्तव्य करना है। इस प्रकार के प्रबंधन के बिना, अर्थात्‌, यदि देहधारी परमेश्वर की सेवकाई खो जाती है, तो सृजित प्राणी का कर्तव्य भी खो जायेगा। अपनी सेवकाई को करने में परमेश्वर का कार्य मनुष्य का प्रबंधन करना है, जबकि मनुष्य का कर्तव्य करना सृष्टा की माँगों को पूरा करने के लिए अपने स्वयं के दायित्वों का प्रदर्शन है और किसी भी तरह से किसी की सेवकाई करना नहीं माना जा सकता है। परमेश्वर, अर्थात्‌, पवित्रात्मा के अंतर्निहित सार के लिए, परमेश्वर का कार्य उसका प्रबंधन है, किन्तु एक सृजन किए गए प्राणी का बाह्य स्वरूप पहने हुए देहधारी परमेश्वर के लिए, उसका कार्य अपनी सेवकाई को पूरा करना है। वह जो कुछ भी कार्य करता है वह अपनी सेवकाई को करने के लिए करता है, और मनुष्य केवल उसके प्रबंधन के क्षेत्र के भीतर और उसकी अगुआई के अधीन ही अपना सर्वोत्तम कर सकता है।"

23/4/18

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "क्या त्रित्व का अस्तित्व है? (भाग 2)


सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "क्या त्रित्व का अस्तित्व है? (भाग 2)



सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की यह अवधारणा सबसे बेतुकी है! यह परमेश्वर को खंडित करता और उसे तीन व्यक्तियों में विभाजित करता है, प्रत्येक एक ओहदे और आत्मा के साथ है; तो कैसे वह अब भी एक आत्मा और एक परमेश्वर हो सकता है? मुझे बताओ, आकाश और पृथ्वी, और उसके भीतर की सारी चीज़ें क्या पिता, पुत्र या पवित्र आत्मा के द्वारा बनाई गई थीं? कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने यह सब एक साथ बनाया। फिर किसने मानवजाति को छुड़ाया? क्या यह पवित्र आत्मा था, पुत्र था या पिता? कुछ लोग कहते हैं कि वह पुत्र था जिसने मानवजाति को छुड़ाया था।

13/4/18

अंतिम दिनों के मसीह के कथन "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है (III) परमेश्वर का अधिकार (II)" (भाग 2)


अंतिम दिनों के मसीह के कथन "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है (III) परमेश्वर का अधिकार (II)" (भाग 2)


इस वीडियो में परमेश्वर के वचन "वचन देह में प्रकट होता है" पुस्तक से हैं। इस वीडियो की सामग्री: एक मनुष्य के जीवन में छ: घटनाक्रम जन्म: पहला घटनाक्रम 1. सृष्टिकर्ता की योजनाओं के फलस्वरूप एक नए जीवन की उत्पत्ति हुई है 2. विभिन्न मानव विभिन्न परिस्थितियों के अंतर्गत जन्म क्यों लेते हैं

3/4/18

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है"


सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है"


सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं "परमेश्वर के जीवन की महानता और सामर्थ्य किसी भी प्राणी के द्वारा मापी नहीं जा सकती। यह ऐसा ही है, ऐसा ही था और आने वाले समय में भी इसी प्रकार से रहेगा। और दूसरा रहस्य है: सभी प्राणियों के लिये परमेश्वर के द्वारा ही जीवन का स्रोत आता है, चाहे वह किसी भी रूप या स्वरूप में हो। तुम किसी भी प्रकार के प्राणी हो, तुम परमेश्वर के द्वारा निर्धारित जीवन के मार्ग को बदल नहीं सकते। किसी भी मामले में, मैं मनुष्य के लिए यही इच्छा करता हूं कि मनुष्य यह समझें कि बिना देखभाल, सुरक्षा और परमेश्वर के प्रावधान के, मनुष्य जो प्राप्त करने के लिए रचा गया है वह प्राप्त नहीं कर सकता, चाहे वह कितना भी अधिक प्रयास या संघर्ष कर ले। परमेश्वर की ओर से प्रदान किये गये जीवन के बिना, मनुष्य अपने जीवन के मूल्य और उद्देश्य को खो देता है।"

23/3/18

परमेश्वर के कथन "क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है"


परमेश्वर के कथन "क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है"



सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं "यीशु के कार्य के बिना मानवजाति दुखों से पार नहीं पा सकती थी, परन्तु बिना देहधारण के आज वे कभी परमेश्वर की सराहना नहीं पा सकते या नये युग में प्रवेश नहीं कर सकते। इस साधारण मनुष्य के आगमन के बिना, तुम सबको कभी भी यह अवसर नहीं मिलता या तुम लोग कभी भी इस योग्य नहीं हो सकते कि परमेश्वर के सच्चे मुख का दर्शन कर सको। क्योंकि तुम जैसों को तो बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था, परंतु परमेश्वर ने दूसरी बार परमेश्वर के देहधारण के कारण तुम लोगों को क्षमा किया है और तुम लोगों पर दया दिखाई है।

ईसाई गाने | अनुभव वीडियो "सारी दुनिया तेरी रोशनी की पनाह में आती"

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