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20/5/19

3. हर किसी को अनुग्रह के युग में पश्चाताप के मार्ग और अंतिम दिनों में अनन्त जीवन के मार्ग के बीच रहे अंतर को अवश्य पहचानना चाहिए।



3. हर किसी को अनुग्रह के युग में पश्चाताप के मार्ग और अंतिम दिनों में अनन्त जीवन के मार्ग के बीच रहे अंतर को अवश्य पहचानना चाहिए।
संदर्भ के लिए बाइबल के पद:
"यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:47-48)।
"जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)।

18/5/19

1. हर किसी को यह समझना चाहिए कि प्रभु यीशु द्वारा अनुग्रह के युग में फैलाया गया संदेश केवल पश्चाताप का मार्ग था।

प्रभु यीशु,


1. हर किसी को यह समझना चाहिए कि प्रभु यीशु द्वारा अनुग्रह के युग में फैलाया गया संदेश केवल पश्चाताप का मार्ग था।
संदर्भ के लिए बाइबल के पद:
"मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है" (मत्ती 4:17)।
"क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लहू है, जो बहुतों के लिये fपापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है" (मत्ती 26:28)।
"और यरूशलेम से लेकर सब जातियों में मन फिराव का और पापों की क्षमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जाएगा" (लूका 24:47)।

17/5/19

2. बचाए जाने और उद्धार के बीच सारभूत अंतर क्या है?

सच्ची प्रार्थना,अनुग्रह का युग
2. बचाए जाने और उद्धार के बीच सारभूत अंतर क्या है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद:
"जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)।
"इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ" (लैयव्यवस्था 11:45)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:
यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया है, उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना, मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था। और इसलिए, मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद, एक नये युग में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर वापस देह में लौटा, और उसने ताड़ना एवं न्याय के कार्य को आरंभ किया, और इस कार्य ने मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में पहुँचा दिया। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़ी आशीषें प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे, और सत्य, मार्ग और जीवन को प्राप्त करेंगे।
"वचन देह में प्रकट होता है" से

13/5/19

3. अनुग्रह के युग की तुलना में राज्य के युग में, कलीसियाई जीवन में क्या अंतर है?



3. अनुग्रह के युग की तुलना में राज्य के युग में, कलीसियाई जीवन में क्या अंतर है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद:
"जब वे खा रहे थे तो यीशु ने रोटी ली, और आशीष माँगकर तोड़ी, और चेलों को देकर कहा, 'लो, खाओ; यह मेरी देह है।' फिर उसने कटोरा लेकर धन्यवाद किया, और उन्हें देकर कहा, 'तुम सब इसमें से पीओ, क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है'" (मत्ती 26:26-28)।
"मैं ने स्वर्गदूत के पास जाकर कहा, 'यह छोटी पुस्तक मुझे दे।' उसने मुझ से कहा, 'ले, इसे खा ले; यह तेरा पेट कड़वा तो करेगी, पर तेरे मुँह में मधु सी मीठी लगेगी'" (प्रकाशितवाक्य 10:9)।

12/5/19

2. अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के कार्य करने के तरीके और जिस तरह राज्य के युग में सर्वशक्तिमान परमेश्वर कार्य करता है, इनके बीच क्या अंतर है?

परमेश्वर का कार्य,अनुग्रह का युग,राज्य का युग


2. अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के कार्य करने के तरीके और जिस तरह राज्य के युग में सर्वशक्तिमान परमेश्वर कार्य करता है, इनके बीच क्या अंतर है?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:
अपने पहले देहधारण के दौरान, बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना परमेश्वर के लिए आवश्यक था क्योंकि उसका कार्य छुटकारा दिलाना था। सम्पूर्ण मानव जाति को छुटकारा दिलाने के लिए, उसे दयालु और क्षमाशील होने की आवश्यकता थी। सलीब पर चढ़ने से पहले उसने जो कार्य किया वह बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना था, जो उसके द्वारा मनुष्य के पाप और गंदगी से उद्धार के पूर्वलक्षण थे। क्योंकि यह अनुग्रह का युग था, इसलिए बीमारों को चंगा करना, उसके द्वारा संकेतों और चमत्कारों को दिखाना परमेश्वर के लिए आवश्यक था, जो उस युग में अनुग्रह के प्रतिनिधि थे; क्योंकि अनुग्रह का युग अनुग्रह प्रदान करने के आस-पास केन्द्रित था, जिसका प्रतीक शान्ति, आनन्द और भौतिक आशीष थे, जो कि सभी यीशु में लोगों के विश्वास की निशानियाँ थी। अर्थात् बीमार को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, और अनुग्रह प्रदान करना, अनुग्रह के युग में यीशु की देह की सहज क्षमताएँ थीं, ये देह में साकार हुए पवित्रात्मा के कार्य थे।
"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार" से

11/5/19

1. अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त वचनों और राज्य के युग में सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों में क्या अंतर है?

प्रभु यीशु,सर्वशक्तिमान परमेश्वर,राज्य का युग

1. अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त वचनों और राज्य के युग में सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों में क्या अंतर है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद:
"मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है" (मत्ती 4:17)।
"और यरूशलेम से लेकर सब जातियों में मन फिराव का और पापों की क्षमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जाएगा" (लूका 24:47)।
"यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा।" (यूहन्ना 12:47-48)।
"क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1पतरस 4:17)।

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